Sunday, May 22, 2022
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Mars 2050 क्या मंगल ग्रह पर 2050 तक बसाई जा सकती है इंसानी बस्ती

Mars 2050 एलोन मस्क पूरी दुनिया की टेक्नोलॉजी एक ही झटके में चेंज करने वाले इंसान है। कई लोग इनको फ्यूचर का इंसान कहते हैं। लोग ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि यह अकेले ऐसे इंसान है जो मानव जाति को मंगल ग्रह पर बसाने के लिए लंबे समय से एक कंपनी बनाकर काम में जुटे हुए हैं। उनका सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि वह आने वाले समय में मंगल ग्रह पर इंसानों को बसा सके।

एलोन मस्क ने क्या कहा है?

किसी एक्सपोर्ट ने इनसे जब पूछा कि आपको इंसानों को पृथ्वी से छोड़कर मंगल ग्रह पर बसाने की बात क्यों कर रहे हैं ? तो इनका जवाब था कि करोड़ों साल पहले एक बहुत बड़ा एस्ट्रो राइड पृथ्वी से टकराया था जिससे कि पृथ्वी पर रहने वाले बड़े-बड़े डायनासोर और बड़े जंतुओं का विनाश हो गया था।

हो सकता है कि आने वाले समय में कुछ ऐसा ही एस्ट्रो राइड पृथ्वी से टकरा जाए और मानव जाति का संपूर्ण खात्मा हो जाए इसलिए इंसानों को बचाने के लिए वह मंगल ग्रह पर जाने की बात कर रहे हैं ऐसा करने के लिए वे तरह-तरह के रॉकेट और स्पेस क्राफ्ट बना रहे हैं जिसमें एलोन मस्क पानी की तरह पैसा बाहा रहें है।

अभी मंगल ग्रह पर रहना इतना आसान नहीं होने वाला है?
उनकी कंपनी ने कुछ बड़े-बड़े प्रयोग कर लिए हैं आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि एलोन मस्क पूरी मानव जाति का बीड़ा उठाकर उन्हें मंगल ग्रह पर पहुंचा पाते है या नहीं। आजकल हर इंसान इसके विषय में बात कर रहा है कि आने वाले समय में इंसान मंगल ग्रह पर अपना घर बना कर अपने परिवार के साथ रह सकेगा, लेकिन इसके साथ वह यह भी जानता है कि जैसा दिखता है वैसा रियल में होता नहीं है। असल में मंगल ग्रह पर रहना इतना आसान नहीं है मंगल ग्रह पर इंसानों को रहने योग्य बनाने के लिए अभी उस पर बहुत सारे काम होना अभी भी बाकी है।

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मंगल ग्रह पर अभी तक क्या-क्या मिले हैं?

मंगल ग्रह की वातावरण की बात की जाए तो वहां पर बहुत अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड मौजूद है जबकि ऑक्सीजन बहुत कम मात्रा में है। इसके अलावा मंगल ग्रह पर नाइट्रोजन गैस भी मौजूद है। सबसे बड़ी बात यह है कि मंगल ग्रह पर पानी भी मौजूद है लेकिन वह तरल मात्रा में ना होकर बर्फ की मात्रा में उपलब्ध है।

मंगल ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण भी है
इसके साथ साथ वहां पर पृथ्वी की तरह गुरुत्वाकर्षण भी है। पृथ्वी के मुकाबले मंगल ग्रह का गुरुत्वाकर्षण केवल एक तिहाई है और यहां पर दिन और रात की बात की जाए तो पृथ्वी और मंगल ग्रह सूर्य की परिक्रमा लगभग एक ही समय पर करते हैं। बस इनमें 40 मिनट का फर्क होता है इन सभी कारणों से ही वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह पर इंसानों को रहने के लिए सबसे उपयुक्त माना है।

मिलेगी बार-बार रॉकेट नष्ट होने की समस्या का समाधान

एलोन मस्क का उद्देश्य यह है कि अगर इंसानों को बचाना है तो मंगल ग्रह पर जाना जरूरी है। मंगल ग्रह की दूरी तय करने के लिए अच्छे खासे पैसों की जरूरत पड़ती है और इस समस्या को दूर करने के लिए उनका यह कहना है कि रीयूज एबिलिटी स्थापित किया जाये अर्थात जब अंतरिक्ष में किसी रॉकेट को भेजा जाता है तो उसका इस्तेमाल केवल एक बार ही हो पाता है लेकिन वह एक ऐसा रॉकेट बनाने में लगे हैं जिसका इस्तेमाल बार-बार किया जा सके।

एलोन मस्क ने ऐसा करने में सफलता भी हासिल कर लिया है। 2015 में स्पेस एक्ट वेलकन 9 रॉकेट को बनाकर एक नया इतिहास रच दिया। यह ऐसा राकेट है जिसका बार बार इस्तेमाल किया जा सकता है और उन्होंने ऐसा करके दिखा दिया है। उन्होंने इस रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजा और धरती पर लैंड कराया ।

मंगल ग्रह के वातावरण को इंसानों के रहने लायक कैसे बनाया जाएगा?
आप यह समझ सकते हैं कि जब किसी चीज का बार बार इस्तेमाल किया जाता है तो उसका कॉस्ट कम हो जाता है। ऐसा नहीं है कि हम सभी मंगल ग्रह पर जाकर बड़े आराम से रहने लगेंगे। वहां रहने के लिए अभी बहुत सारी चुनौतियां है, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वहां का वातावरण इंसानों के रहने के लिए अभी उपयुक्त नहीं है

मंगल ग्रह को इंसानों के रहने के लायक बनाने के लिए टेराफॉर्म करने की आवश्यकता है यानी कि इस ग्रह के वातावरण को पूरी तरह चेंज करने की जरूरत है।

मंगल ग्रह पर कैसे रहेंगें इंसान

स्पेस एक्ट के मालिक एलोन मस्क का कहना है कि मंगल ग्रह पर शुरुआती दिनों में इंसान को कांच की चेंबर में बनी कॉलोनी में रहना होगा जिसके अंदर का तापमान इंसानों के रहने योग्य मेंटेन करके किया जाएगा और धीरे-धीरे जब मंगल ग्रह के वातावरण को इंसानों के रहने योग्य बना दिया जाएगा तब वहां पर कांच की बनी हुई कालोनियों की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मंगल ग्रह पर मिले मटेरियल से ही बनाए जाएंगे स्पेस रॉकेट के इधन

एलोन मस्क का अगला लक्ष्य है कि वह मंगल ग्रह पर ही स्पेशल प्रोपेलेंट बनाना। प्रोपेलेंट क्या मतलब यह है कि मंगल ग्रह पर ही रॉकेट का ईंधन बनाने का काम किया जाएगा। ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि एक बार किसी स्पेस रॉकेट को मंगल ग्रह पर भेज दिया जाएगा तो उसे धरती पर वापस आना ही पड़ेगा।

ऐसा नहीं किया गया तो मंगल ग्रह पर रॉकेट और स्पेस शटल का अंबार लग जाएगा। जो इंसानों के रहने के लिए कम और कबाड़खाना ज्यादा लगेगा। साथ ही साथ वहां पर रहने का जो खर्च है वह बढ़ता चला जाएगा। इसीलिए मंगल ग्रह पर जो इधन मौजूद है उससे इन रॉकेट को चलाने का फ्यूल तैयार किया जाएगा तो वहां पर जाने के लिए लगने वाला जो खर्च है उसे 5 गुना तक कम हो सकता है।

एलोन मस्क का कहना है कि मंगल ग्रह का जो वातावरण है वह ईंधन बढ़ाने के लिए उपयुक्त है। इंसान को मंगल ग्रह पर ले जाने और ले आने के लिए जो लगने वाला इधन है वह अधिक होता है जो कि अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण है। इससे जो स्पेस शटल है वह काफी भारी, लंबा हो जाता है जिसमें अधिक से अधिक इंसानों को नहीं ले जाया जा सकता है।

अगर किसी ऐसी तकनीकी को विकसित किया जाए कि जो मंगल ग्रह पर मिलने वाला इधन है, उससे ही स्पेशल सटल वापस धरती पर आ जाए तो आने वाले दिनों में इंसानों को मंगल ग्रह पर जाने और आने के लिए अतिरिक्त ईंधन लेकर नहीं जाना पड़ेगा।

ऐसा कौन सा ईंधन इस्तेमाल किया जाएगा

देखा जाए तो पृथ्वी पर ही मौजूद ईंधन धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। तो ऐसा कौन सा ईंधन होगा जो मंगल ग्रह पर जाकर वापस आने के लिए सही साबित होगा। ऐसा मान के चलिए कि यदि आपका स्पेस शटल मंगल ग्रह पर चला जाए और वापस आने के लिए उसके पास पर्याप्त ईंधन ना हो तो ऐसा क्या किया जाएगा, तो इसका भी जवाब वैज्ञानिकों के पास है वैज्ञानिकों का कहना है कि जो स्पेस शटल में ईंधन प्रयोग किया जाएगा वह मंगल ग्रह और मौजूद मटेरियल से ही बनाया जाएगा जो स्पेस शटल को वापस आने में मदद करेगा।

आज के समय में रॉकेट में सबसे हाई क्वालिटी का केरोसिन इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन मंगल ग्रह पर जाने वाले रॉकेट में मीथेन गैस का प्रयोग किया जाएगा जिसे मंगल ग्रह पर ही बनाया जा सकता हैं।

यह कैसे काम करेगा

सबसे पहले स्पेसशिप को रॉकेट में फिट किया जाएगा। रॉकेट इसे लेकर पृथ्वी की कक्षा में स्टेबल कर देगा। स्पेसशिप को पृथ्वी की कक्षा में पहुंचाने के बाद यह रॉकेट स्पेसशिप से अलग हो जाएगा और यह राकेट वापस धरती पर सुरक्षित उतर जाएगा। धरती पर वापस उतरने के बाद इसमें फिर से फ्यूल टैंक लगा दिया जाएगा और यह फिर से स्पेसशिप तक पहुंच जाएगा।

स्पेसशिप से कनेक्ट होने के बाद वह इसे मंगल ग्रह की तरफ धकेलना शुरू कर देगा और जब फिर से इसका ईंधन खत्म होगा तो वापस यह धरती पर आएगा। इसी तरह फिर से स्पेसशिप तक पहुंच जाएगा, ऐसा 3 से 5 बार बड़े आसानी से किया जा सकता है। जैसे ही स्पेसशिप मंगल ग्रह के करीब पहुंचने लगेगा उस में लगे हुए सोलर पैनल पूरे स्पेसशिप को पावर देना शुरू कर देंगा। उसके बाद रॉकेट को वापस धरती पर आकर ईंधन ले जाने की जरूरत नहीं होगी।

स्पेसशिप जब मंगल ग्रह पर पहुंच जाएगी तो उस रॉकेट को वापस धरती पर भेजने के लिए मंगल ग्रह पर बनी हुई ईंधन का प्रयोग किया जाएगा। जिससे रॉकेट वापस धरती पर आकर दूसरे स्पेस शटल को फिर से मंगल ग्रह तक ले जा सकता है। इस मिशन को पूरा करने के लिए एक दिन और तारीख निर्धारित की जाएगी।

26 महीने बाद एक ऐसा समय आता है जब पृथ्वी और मंगल ग्रह काफी करीब होते हैं
26 महीने में एक ऐसा समय आता है जब मंगल ग्रह और पृथ्वी काफी करीब होते हैं। जिस दिन को लांच विंडो कहा जाता है और यह सही समय होता है जिस समय स्पेसशिप को मंगल ग्रह पर बड़े आसानी से पहुंचा जा सकता है। जैसे ही यह समय करीब आएगा वैसे ही हजारों स्पेसिफिक मंगल ग्रह पर एक साथ भेजे जा सकते हैं। अगर पृथ्वी पर किसी प्रकार का कोई अपना आती है तो मंगल ग्रह पर 10 लाख लोगों को बसाने के लिए 40 से 50 साल लग सकते हैं।

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